सोमवार, 16 मार्च 2026

खोया-पानी: पुस्तक समीक्षा

श्वेत पृष्ठ जिसपर लोगों की आकृतियाँ उभरी हुई हैं। लाल पृष्ठभूमि पर पुस्तक का शीर्षक और लेखक का नाम लिखे हैं।
पुस्तक का आवरण पृष्ठ
करीब डेढ़ वर्ष पहले की बात है, एक दिन तिवारी जी ने मुझसे मेरा वर्तमान पता मांगा और उस पते पर अमेज़न से एक पुस्तक भेज दी। पुस्तक का भुगतान उन्होंने ही किया था। मैंने पुस्तक को अपने पास रख लिया और सोचा कि इसे भी कभी पढ़ेंगे। मुझे तिवारी जी का यह उपहार अच्छा लगा क्योंकि यह पहली बार था कि किसी ने मुझे पुस्तक उपहार के रूप में दी है। जून 2025 में मैंने किसी छोटी दूरी की यात्रा के दौरान मैंने इस पुस्तक को पढ़ना आरम्भ किया लेकिन कभी ढ़ंग से बैठकर नहीं पढ़ा। पुस्तक मुश्ताक अहमद यूसुफी नामक व्यंग्यकार ने लिखी है। मैं बीबीसी पर जॉन एलिया के बारे में एक वीडियो देख रहा था उसमें भी इन व्यंग्यकार का नाम आया था। ये मूल रूप से उन पाकिस्तानी लोगों में से हैं जिन्होंने भारत के विभाजन के समय भारत के स्थान पर पाकिस्तान को चुना और बाद में इंग्लैण्ड जाकर अपना जीवन व्यापन किया। उनकी उर्दू पर अच्छी पकड़ होने के कारण उन्होंने यह उपन्यास उर्दू में लिखा। उर्दू में इसका शीर्षक "आब-ए-गुम" अथवा "आबे-गुम" है जिसका हिन्दी अनुवाद खोया पानी होता है। यह अनुवाद तुफ़ैल चतुर्वेदी ने किया है। यहाँ यह खोया पानी शीर्षक क्या सोचकर रखा गया होगा, इसका मुझे नहीं पता लेकिन मुझे रहीम के दोहे "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून" की याद दिलाता है। अमेज़न पर खोजने से ज्ञात हुआ कि मूल उर्दू पुस्तक के आवरण पृष्ठ श्वेत है जिसपर हरे-पीले रंग में कुछ कलाकृतियाँ बनी हैं जबकि हिन्दी अनुवाद के आवरण पर एक बाजार का दृश्य दिखाया गया है जिसमें कोई सायकिल-रिक्शा चला रहा है, कोई अपनी गठरी उठाकर चल रहा है, सभी के अलग-अलग रंग वाली चित्रकारी है। कुछ भाग ठीक लगने वाले लाल रंग जैसे रंग पर हिन्दी में लिखा है, "मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के मशहूर उर्दू व्यंग्य उपन्यास 'आबे-गुम' का हिन्दी अनुवाद खोया पानी"। पुस्तक में 286 पृष्ठ होने चाहिए लेकिन मैंने जब कुछ दिन पढ़ा तो ज्ञात हुआ कि मेरे पास उपलब्ध पुस्तक में पृष्ठ संख्या 49 से 64 गायब है। ये पृष्ठ मैंने ऑनलाइन खोजकर पढ़े। चूँकि यह एक उपन्यास है अतः बिशारत इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। इसके अतिरिक्त अन्य कहानियाँ भी बिसारत से जुड़ी हैं या बिना जुड़ी भी हैं। पुस्तक के पहले चरण में पाकिस्तान के शहर कराची का विवरण आता है। भारत के विभाजन के समय करची में ऐसे बहुत लोग चले गये थे जो मूल रूप से कानपूर के थे। लेखक लहजे से राजस्थानी मूल के लगते हैं और ऐसे कई शब्दों का विवरण भी मिलता है जो हिन्दी में प्रचलन में नहीं हैं। पुस्तक के शुरूआती भाग में लेखक और अनुवादक की तारीफ़ की गयी है

भूमिका में कुछ शब्दों ने मुझे मोह लिया। उदाहरण के लिए पृष्ठ संख्या 18 पर नॉस्टेलजिया लिखा है। इसकी परिभाषा के रूप में लिखा है कि जब मनुष्य को वर्तमान से अतीत अधिक सुन्दर दिखायी देने लगे और भविष्य दिखायी देना बन्द हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि वो बूढ़ा हो गया है। यह भी याद रहे कि बुढ़ापे का जवानीलेवा हमला किसी भी उम्र में... विशेष रूप से जवानी में हो सकता है। इसी तरह पृष्ठ संख्या 25 पर बोक शब्द का उल्लेख है। यह शब्द मैं बचपन में घर पर काम लेता था और स्थानीय रूप से बहुत लोगों से सुना है। लेकिन यहाँ उसकी व्याख्या इस रूप में की गई है कि यह जवान और म्स्त बकरा, जो नस्ल बढ़ाने के काम आता है। इसके दाढ़ी होती है और बदन से सख़्त बदबू आती है। मांस भी बदबूदार और रेशेदार होता है। वल्लाह ऐसा शब्द, अर्थ और मांस तीनों से बदबू आती है। बोक शब्द मैं बचपन से घर पर सुनता रहा हूँ और काम में भी बहुत बार लिया है लेकिन इस पुस्तक में नहीं पढ़ा होता तो मैं इस शब्द को खो चुका था। हम सामान्यतः अमर बकरा या बोक शब्द काम में लेते हैं। अमर बकरा का अर्थ वो बकरा नहीं होता जो कभी नहीं मरेगा लेकिन यह सामान्यतः उस बकरे के लिए काम में लिया जाने वाला शब्द है जो कुछ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के उपरान्त सामान्य रूप से खुला छोड़ दिया जाता था। इसका उपयोग बकरियों को गर्भवती करवाने के लिए किया जाता है और इसको मारकर खाया नहीं जाता है। यह सामान्य रूप से अपना पेशाब बार-बार पीता रहता है जिससे इसमें बहुत बदबू (दुर्गंध) आती रहती है। सामान्य रूप में किसी व्यक्ति के कई दिन तक स्नान नहीं करने पर उसमें से आने वाली गंध की तुलना भी इसी से की जाती है और उसे आम बोलचाल में कह देते हैं कि वो बोक की तरह बदबू मारता है।

पहला पाठ धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा है जिसमें सबसे पहले परीक्षा में असफल होने के लाभ बताये गये हैं और दूसरे भाग में शिक्षक होने के लाभ बताये हैं। लेखक के अनुसार ज़लील होने के इतने अवसर होते हैं कि लोगों को सम्मान चाहिए होता है और कुछ भी नहीं। तीसरे भाग का व्यंग्य नेकचलनी से आरम्भ होते हुये स्वघोषित शायरों पर है। चौथा भाग मौलवी मज्जन से तानाशाह तक नाम से व्यंग्य है जिसमें गांधीजी बंदरों वाली कहानी किसी और को श्रेय देते हुये लिखी है तथा एक तानाशाह को सजा देने के विभिन्न तरिके हैं जिनमें अंतिम तरिका ग्वालिन का पास से गुजरना है एवं ग्वालिन को पशुओं के साथ रहने वाली गंध से जोड़कर बताया है। पांचवा भाग हलवाई की दुकान पर खुले में जलेबी खाने पर आये कुत्ते से जोड़कर उनके पिछा करने पर व्यंग्य है। छटे भाग में कुत्ते को टीपू कहने की कहानी का टीपू सुल्तान से सम्बंध बताया है। सातवें भाग में नौकरी के लिए तीन लोगों के साक्षात्कार से पहले का वर्णन है जिसमें अन्य दो लोगों का साक्षात्कार होने के समय बाहर का विवरण है। आठवें भाग में ब्लैक हॉल के नाम से साक्षात्कार के स्थान का वर्णन है और इसमें कुत्ते से सम्बंध या असम्बंध को भी दिखाया गया है। नौंवे भाग में वो साक्षात्कार है जिसमें एक व्यक्ति चयन समिति में पहले से ही चयन करने के लिए तैयार था। दसवें भाग में मूली खोजने पर लिखा है कि कैसे उन्होंने पत्ते देखकर मूली या गाजर के स्वाद का पता लगाना होता है, हालांकि यहाँ कोई विवरण नहीं दिया गया। ग्याहरवाँ भाग हुज़ूर फ़ैज़ गंजूर तहसीलदार साहब पर है, वो कैसे आदेश देते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की तरह सरकार के तलवे चाटने वाले नहीं हैं।

मैं इसी तरह लिखता रहा तो पूरी पुस्तक लिखने जैसा हो जायेगा अतः आगे केवल थोड़े अनुभव लिखना ही बेहतर होगा। पुस्तक के दूसरे भाग में लेखक ने भारत की यात्रा की है। वो मुख्य रूप से कानपुर आये हैं और उन साथियों से बात की है जो विभाजन के समय पाकिस्तान नहीं गये। यहाँ यह स्पष्ट तौर पर दिखाया है कि यहाँ रह गये मुस्लमान अन्य धर्मों के बारे में भी जानते हैं और उनका रहन-सहन पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से भिन्न रह गया है। इसमें शुरूआत में मुझे ऐसे लगा कि यहाँ के मुस्लमानों को पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से अधिक गरीब दिखाया गया है लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अन्तर अलग है। पाकिस्तान चले गये मुसलमानों ने वहाँ मेहनत करके सबकुछ नया किया लेकिन यहाँ रहे मुसलमान अपने पुराने तौर-तरिकों से आगे नहीं बढ़ पाये। जो गरीब है उसने कभी अपनी रोजी-रोटी से अधिक पाने के बारे में सोचा भी नहीं।

पहला पाठ धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा है जिसमें सबसे पहले परीक्षा में असफल होने के लाभ बताये गये हैं और दूसरे भाग में शिक्षक होने के लाभ बताये हैं। लेखक के अनुसार ज़लील होने के इतने अवसर होते हैं कि लोगों को सम्मान चाहिए होता है और कुछ भी नहीं। तीसरे भाग का व्यंग्य नेकचलनी से आरम्भ होते हुये स्वघोषित शायरों पर है। चौथा भाग मौलवी मज्जन से तानाशाह तक नाम से व्यंग्य है जिसमें गांधीजी बंदरों वाली कहानी किसी और को श्रेय देते हुये लिखी है तथा एक तानाशाह को सजा देने के विभिन्न तरिके हैं जिनमें अंतिम तरिका ग्वालिन का पास से गुजरना है एवं ग्वालिन को पशुओं के साथ रहने वाली गंध से जोड़कर बताया है। पांचवा भाग हलवाई की दुकान पर खुले में जलेबी खाने पर आये कुत्ते से जोड़कर उनके पिछा करने पर व्यंग्य है। छटे भाग में कुत्ते को टीपू कहने की कहानी का टीपू सुल्तान से सम्बंध बताया है। सातवें भाग में नौकरी के लिए तीन लोगों के साक्षात्कार से पहले का वर्णन है जिसमें अन्य दो लोगों का साक्षात्कार होने के समय बाहर का विवरण है। आठवें भाग में ब्लैक हॉल के नाम से साक्षात्कार के स्थान का वर्णन है और इसमें कुत्ते से सम्बंध या असम्बंध को भी दिखाया गया है। नौंवे भाग में वो साक्षात्कार है जिसमें एक व्यक्ति चयन समिति में पहले से ही चयन करने के लिए तैयार था। दसवें भाग में मूली खोजने पर लिखा है कि कैसे उन्होंने पत्ते देखकर मूली या गाजर के स्वाद का पता लगाना होता है, हालांकि यहाँ कोई विवरण नहीं दिया गया। ग्याहरवाँ भाग हुज़ूर फ़ैज़ गंजूर तहसीलदार साहब पर है, वो कैसे आदेश देते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की तरह सरकार के तलवे चाटने वाले नहीं हैं।

मैं इसी तरह लिखता रहा तो पूरी पुस्तक लिखने जैसा हो जायेगा अतः आगे केवल थोड़े अनुभव लिखना ही बेहतर होगा। पुस्तक के दूसरे भाग में लेखक ने भारत की यात्रा की है। वो मुख्य रूप से कानपुर आये हैं और उन साथियों से बात की है जो विभाजन के समय पाकिस्तान नहीं गये। यहाँ यह स्पष्ट तौर पर दिखाया है कि यहाँ रह गये मुस्लमान अन्य धर्मों के बारे में भी जानते हैं और उनका रहन-सहन पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से भिन्न रह गया है। इसमें शुरूआत में मुझे ऐसे लगा कि यहाँ के मुस्लमानों को पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से अधिक गरीब दिखाया गया है लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अन्तर अलग है। पाकिस्तान चले गये मुसलमानों ने वहाँ मेहनत करके सबकुछ नया किया लेकिन यहाँ रहे मुसलमान अपने पुराने तौर-तरिकों से आगे नहीं बढ़ पाये। जो गरीब है उसने कभी अपनी रोजी-रोटी से अधिक पाने के बारे में सोचा भी नहीं।

पुस्तक के तीसरे भाग में लेखक वापस पाकिस्तान चले जाते हैं। वहाँ हर बात का उल्लेख ऐसा किया है जैसा फ़िल्मों में होता है और व्यक्ति अपने अपा को जोड़ पाता है। इसमें एक नाई हर कार्य में अपने आप को निपूण पाने के नाटक करता है और सभी काम करता भी है जिसमें घोड़ा-गाडी चलाना और कार चलाना भी शामिल है। वो नाई बिशारत के घरेलू नौकर की तरह हो गया है। इसमें पुलिस के भ्रष्ट होने को भी अच्छे से दिखाया है तो लोगों की नाक पर बात अटकने पर भी अच्छा व्यंग्य है। कहानी आम आदमी को उससे जोड़ती भी है लेकिन उसमें लिखने का तरिका अभी ऐसा रखा गया है जो हर किसी को देखने को नहीं मिलता। पहले भाग में वैश्या को बहुत जोर से दिखाया गया है लेकिन इस भाग तक आते-आते उसे एक सामान्य परम्परा में शामिल कर लिया है। यहाँ अलग से वैश्या के रूप में कुछ नहीं है लेकिन यहाँ केवल पुरुषों की भावनाओं को दिखाया गया है। जैसे एक व्यक्ति जब बलात्कार का समाचार पढ़ता है तो सम्भव है उसे गुस्सा आता है, वो उसका विरोध करता है लेकिन यह भी है कि वो सोचता है कि यह मुझे क्यों नहीं मिलता? उसका गुस्सा महिला पर हुये अत्याचार पर नहीं बल्कि उस कमी में होता है जो उसे स्वयं में दिखाई देती है। वो अपना गुस्सा उस व्यक्ति पर निकालता है जिसने बलात्कार किया है लेकिन कारण लोक दिखावे से अलग होता है। इसके अतिरिक्त एक पठान के बारे में यहाँ बहुत कुछ लिखा है लेकिन अंत में वो पठान कैसे बिशारत पर ऐहसान करके उसका खोया हुआ धन वापस दिलवा देता है, यह सब लिखा है। सबसे आश्चर्यजनक यह था कि पुलिस ने जो माल दबा लिया था वो भी इस पठान ने वापस मंगवा दिया। पुस्तक का सबसे खराब भाग आखिरी पन्ना लगा जहाँ पठान को बिमार करके कुछ ही दिनों का मेहमान घोषित कर दिया। एक पात्र को दिल से जोड़कर उसे बिमार कर देना वास्तविक हो सकता है लेकिन अच्छा तो नहीं लगता।

ये पुस्तक ऐसी लगी जिसे बार-बार पढ़ा जा सकता है। जब भी मन न लगे, इसका कोई भी पृष्ठ उठाकर पढ़ना आरम्भ कर सकते हैं। पुस्तक में जगह-जगह पर शेर और शायरी भी हैं जो एकदम सरल भाषा में हैं और स्वयं पर लागू की जा सकती हैं। पुस्तक मुझे बहुत मजेदार लगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें