सोमवार, 29 जून 2026

मेन आर फ़्रॉम मार्स, विमेन आर फ़्रॉम वीनस: पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का आवरण पृष्ठ
करीब डेढ़ दशक पहले की बात है, मैंने एक पुस्तक के बारे में किसी समाचार पत्र की वेबसाइट पर पढ़ा। मुझे पुस्तक का शीर्षक बहुत अच्छा और अलग लगा था। मुझे शुरूआत में ऐसा लगा कि पुस्तक का दावा है कि पुरुष मंगल ग्रह से आये हैं जबकि महिलायें शुक्र ग्रह से आये हैं। हालांकि पुस्तक को पढ़ना आरम्भ करते ही इसके बारे में समझ में आया। पिछले वर्ष मैंने कुछ पुस्तकें क्रय की थी और इसी दौरान मैंने यह पुस्तक भी क्रय की। पुस्तक का शीर्षक मेन आर फ़्रॉम मार्स, विमेन आर फ़्रॉम वीनस (Men are from Mars, Women are from Venus) है जिसका लेखक जॉन ग्रे (John Gray) है। जॉन ग्रे अमेरिकी लेखक है और उनकी यह पहली प्रकाशित पुस्तक थी। यह पुस्तक सन् 1992 में प्रकाशित हुई अर्थात् मैंने यह पुस्तक प्रकाशन के 34 वर्ष बाद पढ़ी। जो पुस्तक मैंने पढ़ी, उसका आवरण पृष्ठ हरे रंग का है और उसमें कुछ रूपरेखायें व उभार हैं। उभारों को हाथ कि अंगुलियों से अनुभव किया जा सकता है। पुस्तक पर सबसे उपर काले अक्षरों में "You can't live with them, and you can't live without them!" लिखा है अर्थात् आप उनके साथ भी नहीं रह सकते और उनके बिना भी नहीं! इसके बाद श्वेत वर्ण में पुस्तक का शीर्षक लिखा है जिसके उपर दायीं ओर एक युवक का कार्टून है जबकि नीचे बायीं तरफ एक युवती का कार्टून बना हुआ है। नीचे बायीं तरफ लेखक का नाम लिखा है जबकि दायीं ओर "Get seriously involved with the classic guide to surviving the opposite sex." लिखा है अर्थात् विपरीत लिंग के साथ तालमेल बिठाकर रहने के इस उत्कृष्ट पथप्रदर्शक गाइड को गंभीरता से अपनायें। पुस्तक के लिए लेखक जॉन ग्रे ने अपनी पत्नी बॉनी ग्रे (Bonnie Gray) को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया है। पुस्तक में पहले विषयसूची है और बाद में आगे की जानकारी है। विषय सूची में सर्वप्रथम आभार व्यक्ति किया है और उसके बाद प्रस्तावना दी गयी है। प्रस्तावना के बाद पुस्तक का मुख्य भाग आरम्भ होता है जिसमें कुल 13 पाठ हैं।

पुस्तक लिखते समय सहयोग करने वाले विभिन्न व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया गया है। लेखक ने सर्वप्रथम अपनी पत्नी और बाद में अपनी तीन बेटियों का आभार व्यक्त किया है। इसके बाद उन्होंने अपने माता-पिता और विभिन्न दोस्तों को क्रमशः आभार व्यक्त किया है। हालांकि पुस्तक पढ़ने में ऐसे लगता है कि सबसे अधिक योगदान उनकी पत्नी का ही है।

प्रस्तावना की शुरूआत लेखक अपने उन क्षणों से करता है जब लेखक की तीसरी पुत्री लॉरेन का जन्म होता है। लॉरेन के जन्म के बाद लेखक और उनकी पत्नी थके हुए थे। यहाँ स्पष्ट तौर पर झलकता है कि लेखक की पत्नी ने उस समय बहुत अच्छे से नहीं सम्भाला होता तो न यह पुस्तक होती और न ही उनका रिश्ता। लेखक का यह दूसरा विवाह है और इसमें भी वो वैसी ही स्थितियों का सामना कर रहा है जैसा पहले विवाह में किया था। लेकिन इसबार लेखक की पत्नी के सहयोग के कारण उनका न केवल घर बच गया बल्कि लेखक ने भी बहुत कुछ सीखा और यह पुस्तक भी सामने आयी। लेखक के अनुसार उस दिन दोनों के मध्य बहुत लड़ाई वाली बातचीत होती है और लेखक परेशान होकर दूर जाने ही वाला था कि उसकी पत्नी प्यार से कहती है कि वो उसकी बात तो सुन लें। इसके लेखक को भी थोड़ा अच्छा लगता है और वो समस्या को समझते हैं। लेखक ने इसे एक पत्र की तरह लिखा है जिसमें 15 नवम्बर 1991 की तिथि अंकित है। इसके साथ मिल वैली, कैलिफोर्निया का पता भी दिया गया है।

पहले पाठ का शीर्षक और पुस्तक का शीर्षक समान हैं। हालांकि मैं यहाँ इसे अनूदित रूप में कहना चाहूँगा जिसके अनुसार पुरुष मंगल ग्रह से आये हैं और महिलायें शुक्र ग्रह से आयी हैं। इस कारण दोनों की भाषा और कार्य करने के तौर तरिकों में भिन्नता है। शुक्र ग्रह के लोग मंगल ग्रह के लोगों को पसन्द करते थे जबकि मंगल ग्रह के लोग शुक्र ग्रह के लोगों को पसन्द करते थे। वो दोनों एक दूसरे का साथ निभाने के लिए पृथ्वी पर आ गये और भूल गये कि वो अलग-अलग ग्रह से आये हैं जिनकी संस्कृति, भाषा और अन्य विभिन्न संवाद भिन्न हैं। जब वो अपनी इस भिन्नता को याद कर लेते हैं तो समस्याओं का समाधान हो जाता है। इसके अतिरिक्त दोनों को एक दूसरे की भाषा सीखना भी उनके रिश्तों में मिठास लाती है। इस पाठ में इसी बात का उल्लेख है कि हमें अपने अंतर को याद रखना चाहिए। केवल अच्छी इरादों से काम नहीं चलता।

समस्या सुलझाने वाले (पुरुष) और गृह सुधार समिति (महिला) को दूसरे पाठ में समझाया गया है। इसमें मंगल ग्रह पर जीवन अर्थात् पुरुषों के रहन-सहन व शुक्र ग्रह पर जीवन अर्थात् महिलाओं का रहन-सहन समझाया गया है। इसक एबाद यह बताया गया है कि पुरुष को जब महिला सलाह देती है तो वो इसे ले नहीं पाता है और उसे लगता है कि उसे कमजोर समझा जा रहा है। अतः सामान्य स्थानों पर उसे सलाह मत दो, यदि वो सलाह मांगे तो बात अलग है। इसी तरह महिलाओं को समझने के लिए पुरुष को सुनना सीखना चाहिए। महिलायें सुधार करने का प्रयास करती हैं और पुरुष समस्या को सुधारने का प्रयास करते हैं जबकि यहाँ बहुत बड़ी गलतियाँ होती हैं। इसके लिए विभिन्न उदाहरण दिये गये हैं।

तीसरे पाठ में पुरुष के अपनी गुफा में जाने और महिलाओं के अधिक बोलने के बारे में बताया गया है। यह मुख्यतः तनाव के समय की स्थिति को दर्शाया गया है। इसके अनुसार जब पुरुष तनाव अथवा समस्या देखता है तो वो चुप होकर अपनी समस्या को हल करने का प्रयास करता है। ऐसे समय में उससे बात करने उसे परेशान करता है अर्थात् वो अपनी गुफा में जा रहा है। ठीक इसी तरह जब कोई महिला तनाव में अथवा समस्या का सामना कर रही होती है तो वो बहुत अधिक बोलती है। उसका बोलना समस्या से पूर्णतः अलग हो सकता है और इस समय उसे सुनने पर वो अपनी उस निम्न स्तर तक भी जा सकती है जहाँ पुरुष को हर एक समस्या का दोषी बता सकती है जबकि वैसा कोई दोष हो ही नहीं। हालांकि एक न्यूनतम स्तर तक जाने के बाद वो वापसी करती है और वास्तविक समस्या बताती है। महिला की इस स्थिति को इस पाठ/पुस्तक में कूप में जाकर आना बताया है। इसके बाद इसमें बताया गया है कि जब पुरुष अपनी गुफा में जाता है तो महिला को ऐसे लगता है जैसे वो उनसे दूर जा रहा है जबकि उन्हें गुफा में जाने देना चाहिए। ठीक इसी तरह एक महिला के कूप में जाने पर पुरुष को लगता है कि महिला उससे प्यार नहीं करती जबकि वो सबकुछ गलत समझ रहा होता है। इन कठिन स्थितियों में विपरीत लिंगी के व्यवहार को भी समझाया गया है और इसे अलग-अलग लोगों के व्यवहार के रूप में लिखा गया है।

चौथे पाठ में विपरीत-लिंगी (जीवनसाथी) को प्रेरित करने के बारे में लिखा गया है। पुरुष अपने आप को प्रेरित और सशक्त मानता है जब वो अपने आप को जरूरतमंद पाता है जबकि महिला अपने आप को प्रेरित और सशक्त तब मानती है जब उन्हें याद करके स्नेह दिखाया जाता है। इसमें एक महिला के प्यार करने की स्थिति को उल्लिखित किया गया है कि वो ऐसे समय में कैसे व्यवहार करती है और कैसे अनुभव करती है। इसी तरह पुरुष के प्यार होने पर उसके व्यवहार और अनुभवों को भी लिखा गया है। इसमें एक दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं करने का अर्थ एवं महत्त्व समझाया गया है और इसके तरिके भी बताये हैं। इसके अनुसार प्यार में गलतियाँ करना सामान्य है और प्यार पुरुषों को भी चाहिए होता है। इन स्थितियों को उदाहरण सहित समझाया गया है।

पुस्तक के पांचवे अध्याय में अलग भाषा का वर्णन किया गया है। इसमें बताया है कि महिलायें कैसे अपनी भावनाओं को व्यक्त करती हैं और पुरुष कैसे भावनायें व्यक्त करते हैं। इसके अनुसार दोनों की भाषा में शब्दावली समान होती है लेकिन उसके अर्थ भिन्न होते हैं। इसमें उन सामान्य त्रुटियों को समझाया गया है जो दोनों की अलग भाषा के कारण समस्या बनती हैं। इसमें महिलाओं के अधिक बोलने और पुरुषों के अपनी गुफा में जाने को समझाया है। इसमें चेतावनी के संदेशों को समझने का भी वर्णन किया है और कुछ उदाहरण भी दिये हैं। इसी पाठ में पुरुषों के गुफा में जाने और महिलाओं के कूप में जाने के समय किये जाने वाले उस व्यवहार को समझाया है जो उन परिस्थियों के लिए सर्वोत्तम होता है।

छठे पाठ के अनुसार पुरुष रबर बैंड की तरह होते हैं अर्थात् वो कई बार अकारण ही अपनी जीवनसंगिनी से दूर जाने लगते हैं जैसे रबर बैंड को कोई खींच रहा हो। लेखक के अनुसार यह प्रक्रिया बार-बार होती है और महिलाओं को इसकी जानकारी होनी चाहिए। इसमें पुरुष के ऐसे दूर जाने के कारण को भी समझाया है और महिलाओं के इस समय के दर्द को भी समझाया है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को क्या करना चाहिए और कैसे इसे खींचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, यह समझाया है। इस समय का व्यवहार दूरियाँ बढ़ा सकता है। सामान्यतः महिलाओं को ऐसे समय में चुप रहना चाहिए और ऐसा करने से पुरुष अगली बार अधिक प्यार करेगा। लेखक के अनुसार इसकी आवृत्ति और लम्बाई पुरुष के बचपन और माता-पिता के रिश्तों पर निर्भर करता है।

सातवें पाठ में बताया गया है कि महिलायें तरंगों की तरह होती हैं। इसके अनुसार महिलायें कई बार स्वतः ही तरंग के शीर्ष पर होती हैं तो कई बार गर्त में होती हैं। इसका सामने वाले से कोई लेना देना नहीं होता। हालांकि गर्त की गहराई सामने वाले पर निर्भर करती है। यदि सामने वाला उन्हें ध्यान से सुन ले तो वो अपनी गर्त पर जाकर वापस उपर आने लगती हैं लेकिन उन्हें ध्यान से नहीं सुनने की स्थिति में गर्त की गहराई और अधिक हो जाती है। मैंने मेरे दैनिक जीवन में भी यह व्यवहार बहुतायत में देखा है। पुस्तक में इस गर्त को कूप कहा गया है। इसे विभिन्न तरिकों के साथ समझाया है और इसे समझने के कुछ सरल उपाय भी बताये हैं। इसमें उस स्थिति को भी बताया है जब महिला अपने कूप की तरफ बढ़ रही है जहाँ उसे सुनने वाला चाहिए और पुरुष अपनी गुफा की तरफ जा रहा हो जब वो किसी को सुनने की स्थिति में नहीं जाना चाहता है। उनके तर्क किस तरह के और अलग-अलग होते हैं, पुराने भावनायें कैसे सामने आती हैं, भावनाओं में बुरा लगना और महिला-पुरुष के आपसी लड़ाई को भी यहाँ समझाया गया है। इस स्थिति में एक दूसरे को सम्भालने की विधियाँ भी बताई गयी हैं जो पढ़ने में बहुत सरल लगती हैं। इसके बाद इसमें यह भी बताया कि धन कैसे प्यार का दुश्मन बन जाता है। अर्थात् प्यार और रिश्तों का सीधे तौर पर सम्पति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन पैसा कमाने के चक्कर में लोग एक दूसरे को कम समय दे पाते हैं जो रिश्तों के लिए बुरा होता है। इसके अतिरिक्त जब सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है तो लोगों को प्यार की आवश्यकता महसूस होती है। इस तरह भावनाओं के महत्त्व को इसमें समझाया गया है।

आठवें अध्याय में महिला और पुरुष की अलग-अलग भावनाओं को दिखाया गया है। इसमें शुरूआती रूप से 12 तरह के प्यार को बताया गया है। इसमें महिलाओं के लिए छः प्यार इस तरह हैं: ख्याल रखना, उन्हें समझना, सम्मान देना, निष्ठा रखना, अपनी बात का समर्थन पाना, आश्वासन पाना। पुरुष के लिए छः प्यार इस तरह हैं: विश्वास करना, स्वीकार्यता, सराहा जाना, तारीफ़ करना, उनके साथ संतुष्टि और प्रोत्साहन पाना। लेखक ने इन्हें शुरूआती प्यार के लक्षणों में बांटा है जबकि लेखक का कहना है कि दोनों को ही पूरे 12 तरह के लक्षण चाहिए लेकिन शुरूआती और पूर्ण में अंतर को यहाँ लिखा गया है। इन सभी को एक-एक करके समझाया है और इसके बाद एक चमकते कवच वाले योद्धा की कहानी लिखी है। यह कहानी समझाने के लिए है कि एक पुरुष की सहायता करना कैसे उसे दूर कर देता है। इसमें वो स्थितियाँ समझायी गयी हैं जिनमें प्यार खत्म होने लगता है। इसमें मुख्य समझ यह है कि लोग वो ही देते हैं जो वो पाना चाहते हैं और इस स्थिति में प्यार मरने लगता है।

अध्याय 9 में बहस से बचने के तरिके सुझाये गये हैं। इसमें बताया गया है कि हम बहस क्यों करते हैं और इससे बुरा क्यों लगता है? बुरा लगने से बचने के लिए क्या करना चाहिए, इसके लिए चार बिंदू रखे गये हैं। इन चार बिंदुओं में पहला आक्रमण है जिसके अनुसार पुरुष बहस में जीतने का प्रयास करता है और इसके लिए वो बहुत अधिक ताबड़तौड़ हमले करता है। दूसरे बिंदू के अनुसार जब पुरुष हारने लगता है तो वो हार स्वीकार करने के स्थान पर वहाँ से भागने लगता है और अपनी गुफा में चला जाता है। तीसरा और चौथा तरिका महिलाओं का होता है जिसमें वो बहस की स्थिति में ऐसे व्यवहार करती हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो और इससे उन्हें आंतरिक रूप से दुख होता है। इसके अतिरिक्त वो कई बार पूर्ण समर्पण भी कर देती हैं जिससे वो तात्कालिक रूप से समस्या का हल हो जाता है लेकिन लम्बे समय के लिये वो बहुत दुखी हो जाती हैं। इसमें आगे बहस करने के छुपे हुये कारणों को बताया गया है। इसमें बहस से बचने के लिए छुपे हुये कारणों को समझने का तरिका भी बताया गया है।

अध्याय 10 में अपने प्रेमी का दिल जीतने के तरिके बताये हैं। इसे अंकों के रूप में दिखाया है और बताया गया है कि महिलायें आपके पक्ष में आपके हर अच्छे काम के लिए एक अंक जोड़ देती हैं। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह बात है कि आप किसी महिला को एक रुपये का उपहार दें या एक लाख रुपये का उपहार दें, वो आपके लिए एक अंक की बढ़ोतरी ही करेंगी। इसके लिए यहाँ वो 101 तरिके लिखे हैं जिसमें महिलायें आपको अंक देंगी। इसके बाद इन तरिकों के कारणों को समझाया है। इसके बाद वो 26 तरिके लिखे हैं जिनसे पुरुष महिला को अंक देते हैं अर्थात् प्यार करते हैं। पुरुष हर काम के लिए अलग-अलग अंक देते हैं और उनके अंकों की संख्या एक से आरम्भ होकर 60 तक हो सकती है। अर्थात् वो एक ही काम के 60 अंक एकसाथ दे सकते हैं। इसके बाद इसी अंक में अंक कटने के तरिके भी बताये हैं जो अंक देने के स्थान पर उन्हें अप्रत्याशित रूप से कम कर देते हैं।

ग्याहरवें अध्याय में प्रेम पत्र लिखने की बात की गयी है। यहाँ प्रेम पत्र को कागज पर लिखना या कंप्यूटर पर लिखने की बात कही गयी है। यहाँ प्रेम पत्र केवल अपने प्रेमी या जीवनसाथी को नहीं लिखवाया बल्कि सभी को लिखने के लिए कहा गया है। इसमें प्रेमपत्र की तकनीक को बताया है जिसमें प्रेमपत्र को तीन भागों में बांटने के लिए लिखा है। इसमें पहला भाग क्रोध, दुख, डर, अफ़सोस और प्रेम की भावनाओं को लिखने के लिए कहा है, दूसरे जवाबी पत्र अथवा पहले पत्र का उत्तर लिखना सीखाया है और तीसरा भाग सम्बंधित व्यक्ति को प्रेम पत्र और इसके उत्तर को पढ़ाने या सुनाने के बारे में कहा गया है। प्रेमपत्र लिखने के विभिन्न प्रारूप और प्रेमपत्र भी दिये गये हैं जिससे लिखने वाले को सहायता मिल सकती है।

बाहरवें अध्याय में अपने साथी से मदद मांगने की विधियाँ बतायी हैं। इसके शुरुआत में बताया है कि महिलायें मदद क्यों नहीं मांगती हैं। इसमें वो तरिके बताये हैं जिनके माध्यम से महिलाओं को अपने साथी से मदद मांगनी चाहिए। इसमें मुख्य बात यह है कि महिलाओं को सीधे मदद मांगनी चाहिए। परोक्ष रूप से सहायता मांगने पर पुरुष उसे अपमान की तरह मानता है। इसमें पहले चरण में महिलाओं को वो प्रश्न पूछना सीखाया गया है जो उन्हें मिल रहा है। दूसरे चरण में उन्हें सहायता के लिए पूछे जाने वाले प्रश्नों के बारे में बताया गया है और तीसरा चरण दृढ़ता से प्रश्न पूछने और सहायता पाने का तरिका सीखाया गया है।

तेहरें और अंतिम अध्याय में प्यार को ज़िंदा रखने के तरिकों को समझाया है। इसके शुरूआत में 12 कारण दिये हैं जिससे जोड़ों में लड़ाई होती है। इसमें लिखा है कि आप भी इन कारणों में से कोई एक अपने साथ में देखोगो। इसमें आगे बताया गया है कि जोड़ों में होने वाली लड़ाइयों में 90 प्रतिशत कारण उनके साथी से जुड़े न होकर उनकी स्वयं की पृष्ठभूमि से जुड़े होते हैं। इसके अंत में प्यार को ऋतुओं से जोड़कर दिखाया है। इसके अनुसार प्यार का पहला चरण वसंत की तरह होता है जिसमें सबकुछ सुहावना और अच्छा लगता है। इसमें लोग अपने साथी को आदर्श की तरह देखते हैं। प्यार का दूसरा चरण ग्रीष्मकाल की तरह होता है जिसमें ऐसा लगता है कि उनका साथी आदर्श नहीं है और उसमें भी कमियाँ हैं। लेखक के अनुसार इस चरण में लोग अपने साथी को दोष देते हैं जबकि यह एकदूसरे को समझने और सहायता करने का समय होता है। तीसरा चरण पतझड़ का समय होता है और इसी समय प्यार के फल खाने को मिलते हैं। इसमें अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं। इसका अंतिम चरण शिशिर काल अर्थात् शीतकाल होता है। यह समय पुरुषों के लिए उनकी गुफा में जाने का और महिलाओं के लिए अपने कूप में जाने का होता है। यदि वो यह समय सफलतापूर्वक निकाल दें तो उनका वसंत पुनः आ जाता है। इस तरह आप अपने सम्बंधों को सफल बना सकते हो।

इस तरह पुस्तक बहुत ही अच्छे ढ़ंग से और अच्छे उदाहरणों के साथ लिखी गयी है।

सोमवार, 16 मार्च 2026

खोया-पानी: पुस्तक समीक्षा

श्वेत पृष्ठ जिसपर लोगों की आकृतियाँ उभरी हुई हैं। लाल पृष्ठभूमि पर पुस्तक का शीर्षक और लेखक का नाम लिखे हैं।
पुस्तक का आवरण पृष्ठ
करीब डेढ़ वर्ष पहले की बात है, एक दिन तिवारी जी ने मुझसे मेरा वर्तमान पता मांगा और उस पते पर अमेज़न से एक पुस्तक भेज दी। पुस्तक का भुगतान उन्होंने ही किया था। मैंने पुस्तक को अपने पास रख लिया और सोचा कि इसे भी कभी पढ़ेंगे। मुझे तिवारी जी का यह उपहार अच्छा लगा क्योंकि यह पहली बार था कि किसी ने मुझे पुस्तक उपहार के रूप में दी है। जून 2025 में मैंने किसी छोटी दूरी की यात्रा के दौरान मैंने इस पुस्तक को पढ़ना आरम्भ किया लेकिन कभी ढ़ंग से बैठकर नहीं पढ़ा। पुस्तक मुश्ताक अहमद यूसुफी नामक व्यंग्यकार ने लिखी है। मैं बीबीसी पर जॉन एलिया के बारे में एक वीडियो देख रहा था उसमें भी इन व्यंग्यकार का नाम आया था। ये मूल रूप से उन पाकिस्तानी लोगों में से हैं जिन्होंने भारत के विभाजन के समय भारत के स्थान पर पाकिस्तान को चुना और बाद में इंग्लैण्ड जाकर अपना जीवन व्यापन किया। उनकी उर्दू पर अच्छी पकड़ होने के कारण उन्होंने यह उपन्यास उर्दू में लिखा। उर्दू में इसका शीर्षक "आब-ए-गुम" अथवा "आबे-गुम" है जिसका हिन्दी अनुवाद खोया पानी होता है। यह अनुवाद तुफ़ैल चतुर्वेदी ने किया है। यहाँ यह खोया पानी शीर्षक क्या सोचकर रखा गया होगा, इसका मुझे नहीं पता लेकिन मुझे रहीम के दोहे "रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून" की याद दिलाता है। अमेज़न पर खोजने से ज्ञात हुआ कि मूल उर्दू पुस्तक के आवरण पृष्ठ श्वेत है जिसपर हरे-पीले रंग में कुछ कलाकृतियाँ बनी हैं जबकि हिन्दी अनुवाद के आवरण पर एक बाजार का दृश्य दिखाया गया है जिसमें कोई सायकिल-रिक्शा चला रहा है, कोई अपनी गठरी उठाकर चल रहा है, सभी के अलग-अलग रंग वाली चित्रकारी है। कुछ भाग ठीक लगने वाले लाल रंग जैसे रंग पर हिन्दी में लिखा है, "मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के मशहूर उर्दू व्यंग्य उपन्यास 'आबे-गुम' का हिन्दी अनुवाद खोया पानी"। पुस्तक में 286 पृष्ठ होने चाहिए लेकिन मैंने जब कुछ दिन पढ़ा तो ज्ञात हुआ कि मेरे पास उपलब्ध पुस्तक में पृष्ठ संख्या 49 से 64 गायब है। ये पृष्ठ मैंने ऑनलाइन खोजकर पढ़े। चूँकि यह एक उपन्यास है अतः बिशारत इस उपन्यास का मुख्य पात्र है। इसके अतिरिक्त अन्य कहानियाँ भी बिसारत से जुड़ी हैं या बिना जुड़ी भी हैं। पुस्तक के पहले चरण में पाकिस्तान के शहर कराची का विवरण आता है। भारत के विभाजन के समय करची में ऐसे बहुत लोग चले गये थे जो मूल रूप से कानपूर के थे। लेखक लहजे से राजस्थानी मूल के लगते हैं और ऐसे कई शब्दों का विवरण भी मिलता है जो हिन्दी में प्रचलन में नहीं हैं। पुस्तक के शुरूआती भाग में लेखक और अनुवादक की तारीफ़ की गयी है

भूमिका में कुछ शब्दों ने मुझे मोह लिया। उदाहरण के लिए पृष्ठ संख्या 18 पर नॉस्टेलजिया लिखा है। इसकी परिभाषा के रूप में लिखा है कि जब मनुष्य को वर्तमान से अतीत अधिक सुन्दर दिखायी देने लगे और भविष्य दिखायी देना बन्द हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि वो बूढ़ा हो गया है। यह भी याद रहे कि बुढ़ापे का जवानीलेवा हमला किसी भी उम्र में... विशेष रूप से जवानी में हो सकता है। इसी तरह पृष्ठ संख्या 25 पर बोक शब्द का उल्लेख है। यह शब्द मैं बचपन में घर पर काम लेता था और स्थानीय रूप से बहुत लोगों से सुना है। लेकिन यहाँ उसकी व्याख्या इस रूप में की गई है कि यह जवान और म्स्त बकरा, जो नस्ल बढ़ाने के काम आता है। इसके दाढ़ी होती है और बदन से सख़्त बदबू आती है। मांस भी बदबूदार और रेशेदार होता है। वल्लाह ऐसा शब्द, अर्थ और मांस तीनों से बदबू आती है। बोक शब्द मैं बचपन से घर पर सुनता रहा हूँ और काम में भी बहुत बार लिया है लेकिन इस पुस्तक में नहीं पढ़ा होता तो मैं इस शब्द को खो चुका था। हम सामान्यतः अमर बकरा या बोक शब्द काम में लेते हैं। अमर बकरा का अर्थ वो बकरा नहीं होता जो कभी नहीं मरेगा लेकिन यह सामान्यतः उस बकरे के लिए काम में लिया जाने वाला शब्द है जो कुछ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के उपरान्त सामान्य रूप से खुला छोड़ दिया जाता था। इसका उपयोग बकरियों को गर्भवती करवाने के लिए किया जाता है और इसको मारकर खाया नहीं जाता है। यह सामान्य रूप से अपना पेशाब बार-बार पीता रहता है जिससे इसमें बहुत बदबू (दुर्गंध) आती रहती है। सामान्य रूप में किसी व्यक्ति के कई दिन तक स्नान नहीं करने पर उसमें से आने वाली गंध की तुलना भी इसी से की जाती है और उसे आम बोलचाल में कह देते हैं कि वो बोक की तरह बदबू मारता है।

पहला पाठ धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा है जिसमें सबसे पहले परीक्षा में असफल होने के लाभ बताये गये हैं और दूसरे भाग में शिक्षक होने के लाभ बताये हैं। लेखक के अनुसार ज़लील होने के इतने अवसर होते हैं कि लोगों को सम्मान चाहिए होता है और कुछ भी नहीं। तीसरे भाग का व्यंग्य नेकचलनी से आरम्भ होते हुये स्वघोषित शायरों पर है। चौथा भाग मौलवी मज्जन से तानाशाह तक नाम से व्यंग्य है जिसमें गांधीजी बंदरों वाली कहानी किसी और को श्रेय देते हुये लिखी है तथा एक तानाशाह को सजा देने के विभिन्न तरिके हैं जिनमें अंतिम तरिका ग्वालिन का पास से गुजरना है एवं ग्वालिन को पशुओं के साथ रहने वाली गंध से जोड़कर बताया है। पांचवा भाग हलवाई की दुकान पर खुले में जलेबी खाने पर आये कुत्ते से जोड़कर उनके पिछा करने पर व्यंग्य है। छटे भाग में कुत्ते को टीपू कहने की कहानी का टीपू सुल्तान से सम्बंध बताया है। सातवें भाग में नौकरी के लिए तीन लोगों के साक्षात्कार से पहले का वर्णन है जिसमें अन्य दो लोगों का साक्षात्कार होने के समय बाहर का विवरण है। आठवें भाग में ब्लैक हॉल के नाम से साक्षात्कार के स्थान का वर्णन है और इसमें कुत्ते से सम्बंध या असम्बंध को भी दिखाया गया है। नौंवे भाग में वो साक्षात्कार है जिसमें एक व्यक्ति चयन समिति में पहले से ही चयन करने के लिए तैयार था। दसवें भाग में मूली खोजने पर लिखा है कि कैसे उन्होंने पत्ते देखकर मूली या गाजर के स्वाद का पता लगाना होता है, हालांकि यहाँ कोई विवरण नहीं दिया गया। ग्याहरवाँ भाग हुज़ूर फ़ैज़ गंजूर तहसीलदार साहब पर है, वो कैसे आदेश देते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की तरह सरकार के तलवे चाटने वाले नहीं हैं।

मैं इसी तरह लिखता रहा तो पूरी पुस्तक लिखने जैसा हो जायेगा अतः आगे केवल थोड़े अनुभव लिखना ही बेहतर होगा। पुस्तक के दूसरे भाग में लेखक ने भारत की यात्रा की है। वो मुख्य रूप से कानपुर आये हैं और उन साथियों से बात की है जो विभाजन के समय पाकिस्तान नहीं गये। यहाँ यह स्पष्ट तौर पर दिखाया है कि यहाँ रह गये मुस्लमान अन्य धर्मों के बारे में भी जानते हैं और उनका रहन-सहन पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से भिन्न रह गया है। इसमें शुरूआत में मुझे ऐसे लगा कि यहाँ के मुस्लमानों को पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से अधिक गरीब दिखाया गया है लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अन्तर अलग है। पाकिस्तान चले गये मुसलमानों ने वहाँ मेहनत करके सबकुछ नया किया लेकिन यहाँ रहे मुसलमान अपने पुराने तौर-तरिकों से आगे नहीं बढ़ पाये। जो गरीब है उसने कभी अपनी रोजी-रोटी से अधिक पाने के बारे में सोचा भी नहीं।

पहला पाठ धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा है जिसमें सबसे पहले परीक्षा में असफल होने के लाभ बताये गये हैं और दूसरे भाग में शिक्षक होने के लाभ बताये हैं। लेखक के अनुसार ज़लील होने के इतने अवसर होते हैं कि लोगों को सम्मान चाहिए होता है और कुछ भी नहीं। तीसरे भाग का व्यंग्य नेकचलनी से आरम्भ होते हुये स्वघोषित शायरों पर है। चौथा भाग मौलवी मज्जन से तानाशाह तक नाम से व्यंग्य है जिसमें गांधीजी बंदरों वाली कहानी किसी और को श्रेय देते हुये लिखी है तथा एक तानाशाह को सजा देने के विभिन्न तरिके हैं जिनमें अंतिम तरिका ग्वालिन का पास से गुजरना है एवं ग्वालिन को पशुओं के साथ रहने वाली गंध से जोड़कर बताया है। पांचवा भाग हलवाई की दुकान पर खुले में जलेबी खाने पर आये कुत्ते से जोड़कर उनके पिछा करने पर व्यंग्य है। छटे भाग में कुत्ते को टीपू कहने की कहानी का टीपू सुल्तान से सम्बंध बताया है। सातवें भाग में नौकरी के लिए तीन लोगों के साक्षात्कार से पहले का वर्णन है जिसमें अन्य दो लोगों का साक्षात्कार होने के समय बाहर का विवरण है। आठवें भाग में ब्लैक हॉल के नाम से साक्षात्कार के स्थान का वर्णन है और इसमें कुत्ते से सम्बंध या असम्बंध को भी दिखाया गया है। नौंवे भाग में वो साक्षात्कार है जिसमें एक व्यक्ति चयन समिति में पहले से ही चयन करने के लिए तैयार था। दसवें भाग में मूली खोजने पर लिखा है कि कैसे उन्होंने पत्ते देखकर मूली या गाजर के स्वाद का पता लगाना होता है, हालांकि यहाँ कोई विवरण नहीं दिया गया। ग्याहरवाँ भाग हुज़ूर फ़ैज़ गंजूर तहसीलदार साहब पर है, वो कैसे आदेश देते हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की तरह सरकार के तलवे चाटने वाले नहीं हैं।

मैं इसी तरह लिखता रहा तो पूरी पुस्तक लिखने जैसा हो जायेगा अतः आगे केवल थोड़े अनुभव लिखना ही बेहतर होगा। पुस्तक के दूसरे भाग में लेखक ने भारत की यात्रा की है। वो मुख्य रूप से कानपुर आये हैं और उन साथियों से बात की है जो विभाजन के समय पाकिस्तान नहीं गये। यहाँ यह स्पष्ट तौर पर दिखाया है कि यहाँ रह गये मुस्लमान अन्य धर्मों के बारे में भी जानते हैं और उनका रहन-सहन पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से भिन्न रह गया है। इसमें शुरूआत में मुझे ऐसे लगा कि यहाँ के मुस्लमानों को पाकिस्तान चले गये मुस्लमानों से अधिक गरीब दिखाया गया है लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि यह अन्तर अलग है। पाकिस्तान चले गये मुसलमानों ने वहाँ मेहनत करके सबकुछ नया किया लेकिन यहाँ रहे मुसलमान अपने पुराने तौर-तरिकों से आगे नहीं बढ़ पाये। जो गरीब है उसने कभी अपनी रोजी-रोटी से अधिक पाने के बारे में सोचा भी नहीं।

पुस्तक के तीसरे भाग में लेखक वापस पाकिस्तान चले जाते हैं। वहाँ हर बात का उल्लेख ऐसा किया है जैसा फ़िल्मों में होता है और व्यक्ति अपने अपा को जोड़ पाता है। इसमें एक नाई हर कार्य में अपने आप को निपूण पाने के नाटक करता है और सभी काम करता भी है जिसमें घोड़ा-गाडी चलाना और कार चलाना भी शामिल है। वो नाई बिशारत के घरेलू नौकर की तरह हो गया है। इसमें पुलिस के भ्रष्ट होने को भी अच्छे से दिखाया है तो लोगों की नाक पर बात अटकने पर भी अच्छा व्यंग्य है। कहानी आम आदमी को उससे जोड़ती भी है लेकिन उसमें लिखने का तरिका अभी ऐसा रखा गया है जो हर किसी को देखने को नहीं मिलता। पहले भाग में वैश्या को बहुत जोर से दिखाया गया है लेकिन इस भाग तक आते-आते उसे एक सामान्य परम्परा में शामिल कर लिया है। यहाँ अलग से वैश्या के रूप में कुछ नहीं है लेकिन यहाँ केवल पुरुषों की भावनाओं को दिखाया गया है। जैसे एक व्यक्ति जब बलात्कार का समाचार पढ़ता है तो सम्भव है उसे गुस्सा आता है, वो उसका विरोध करता है लेकिन यह भी है कि वो सोचता है कि यह मुझे क्यों नहीं मिलता? उसका गुस्सा महिला पर हुये अत्याचार पर नहीं बल्कि उस कमी में होता है जो उसे स्वयं में दिखाई देती है। वो अपना गुस्सा उस व्यक्ति पर निकालता है जिसने बलात्कार किया है लेकिन कारण लोक दिखावे से अलग होता है। इसके अतिरिक्त एक पठान के बारे में यहाँ बहुत कुछ लिखा है लेकिन अंत में वो पठान कैसे बिशारत पर ऐहसान करके उसका खोया हुआ धन वापस दिलवा देता है, यह सब लिखा है। सबसे आश्चर्यजनक यह था कि पुलिस ने जो माल दबा लिया था वो भी इस पठान ने वापस मंगवा दिया। पुस्तक का सबसे खराब भाग आखिरी पन्ना लगा जहाँ पठान को बिमार करके कुछ ही दिनों का मेहमान घोषित कर दिया। एक पात्र को दिल से जोड़कर उसे बिमार कर देना वास्तविक हो सकता है लेकिन अच्छा तो नहीं लगता।

ये पुस्तक ऐसी लगी जिसे बार-बार पढ़ा जा सकता है। जब भी मन न लगे, इसका कोई भी पृष्ठ उठाकर पढ़ना आरम्भ कर सकते हैं। पुस्तक में जगह-जगह पर शेर और शायरी भी हैं जो एकदम सरल भाषा में हैं और स्वयं पर लागू की जा सकती हैं। पुस्तक मुझे बहुत मजेदार लगी।